नहीं रहना मुझे उस समाज में

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां मेरे पैदा होते ही मुझे कुल की ज्योति समझने की बजाए बोझ समझा जाए।

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां मेरे लिंग के कारण मुझे दूध की जगह रोटी दाल दी जाए।

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां मेरी कौशल विकास को रोककर, हाथों में कॉपी पेन, खिलौने की बजाय, झाड़ू

थमाई जाए। 

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां मेरी शिक्षा का अधिकार छीनकर, संस्कारों के नाम पर घर पर रखा जाए।

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां मेरी किशोरावस्था को देख, घर की इज्जत के नाम पर मुझे समझने की बजाय, चुन्नी से ढकने को कहा जाए।

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां पूर्ण रूप से परिपक्व होने से पहले ही, शादी के नाम पर बेटी को नौकरानी बनाकर पराए घर भेज दिया जाए।

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां एक बहू, को श्रृंगार और शोभा के नाम पर बेड़ियों में जकड़ दिया जाए। 

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां स्त्री को सुशील और सहनशीलता की देवी कहकर, मेरी  सभी इच्छाओं भावनाओं सपनों को सहनशीलता की आग में जला दिया जाए।  

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां “मां बच्चे की जां” के नाम पर बच्चों के पालन पोषण की सभी जिम्मेदारियां मुझे  सौंप दिया जाए।

नहीं रहना मुझे उस समाज में जहां महिलाओं को परंपराओं के नाम पर हर एक पल घुट – घुट कर जीना सिखाया जाए।


नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां स्वर्ग पाने की इच्छा में, माता पिता की चिता को आग लगाने का अधिकार सिर्फ एक बेटा ही दिया जाए। 

नहीं रहना मुझे उस समाज में, जहां स्त्रियां को  पुरुषों को बलवान और भगवान मानना और स्वयं को उनकी दासी समझना सिखाया जाए ।

मैं रहना चाहती हूँ उस समाज में, जहाँ बेटी बोझ नहीं, बराबरी हो; जहाँ उसके सपनों को पंख मिलें और उसकी पहचान उसके लिंग से नहीं, उसके अस्तित्व से हो।

Project Mukti

Project Mukti works with Dalit, Bahujan, Adivasi women and children to bring positive and sustainable change in their lives.

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