ज़िंदगी ज़िंदा दिलों का नाम है, मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं
सच में, ज़िंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, कितने भी पहाड़ टूट पड़ें, ज़िंदादिली को ज़िंदा रखना ज़रूरी होता है। हालात से डर कर भागने की बजाय उनका सामना करो, रोओ, टूटो, जो मन करे करो, लेकिन खुशियों की कुर्बानी हालात के आगे मत दो। इसी बात को भूलकर मैंने अपने कई साल बर्बाद कर दिए। लेकिन बीता हुआ कल तो राख जैसा होता है, इसलिए अब मैं उस बर्बाद वक़्त को भी एक सीख की तरह याद करता हूं, जश्न की तरह मनाता हूं।
मैं हमेशा खुद से और अपनी आत्मा से छुपता रहा। हिंदी और मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स करते हुए भी अंदर से इतना डरा हुआ था कि उस डर को शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मैंने खुद को समाज से इतना छुपाया कि मेरे अंदर के एहसास लावा बनकर सुलगने लगे। मैं डिप्रेशन में जीने लगा, खुलकर सांस लेना भी मुश्किल हो गया। घर से बाहर निकलते वक़्त किसी न किसी का साथ होना मेरी मजबूरी बन गया एग्ज़ाम देने जाना हो तो किसी दोस्त को सेंटर के बाहर खड़ा रखना, दुकान जाना हो तो किसी का साथ। मैंने कभी खुद को अकेला पाया ही नहीं।
ये कहानी यूं ही चलती रहेगी कि मैं अकेला था, या अकेलापन मैंने खुद चुना था।
2026 की शुरुआत में मैंने "प्रोजेक्ट मुक्ति" की एक बेहतरीन पहल ज़िंदगी फेलोशिप का फॉर्म भरा। पहले चरण में सिलेक्ट हुआ, फिर 3-4 इंटरव्यू हुए, और आख़िरकार मेरा चयन हो गया। उस दिन खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, जिस चीज़ के लिए मेहनत की थी, उसका फल आख़िर मिल ही गया।
फेलोशिप की शुरुआत में एक दो दिन का रेजिडेंशियल वर्कशॉप था। ये पहली बार था जब मैं घर से दो दिन दूर रहने वाला था, और यही दूरी मेरे लिए मील का पत्थर साबित हुई। वहां जाकर मैंने खुद में बहुत कुछ नया महसूस किया और सबसे बड़ी बात, आत्मविश्वास। धीरे-धीरे कई बदलाव आते गए, और मैंने ज़िंदगी फेलोशिप के साथ फिर से जीना सीख लिया।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है डर हमें रोकता नहीं, बस छुपाता है। और जिस दिन हम खुद का सामना करने की हिम्मत जुटा लेते हैं, उसी दिन असली ज़िंदगी शुरू होती है। मैंने बरसों अकेलेपन में गुज़ार दिए, लेकिन आख़िर में यही सीखा कि टूटना कमज़ोरी नहीं, दोबारा उठने की शुरुआत होती है।
तो अगर आप भी किसी अंधेरे कोने में खुद को छुपाए बैठे हैं, बाहर निकलिए। खुद को एक मौका दीजिए। क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ सांस लेने का नाम नहीं, ज़िंदादिली से जीने का नाम है।

